★ क्या प्रस्तावना संविधान का भाग है ? -
प्रस्तावना संविधान का एक भाग या अभिन्न अंग हैं या नहीं है इस विषय पर Supreme Court /सर्वोच्च न्यायालय में कई बार बहस हुई है जिसमें अलग-अलग मामलों में Supreme Court ने अपने अलग-अलग फैसला दिया है लेकिन केशवानंद भारती vs केरल राज्य विवाद में Supreme Court ने इस विषय पर अन्तिम फैसले में यह कहा कि प्रस्तावना संविधान का एक
सम्माननीय भाग है
• इन री बेरूबारी (1960) केस :
इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उद्देशिका संविधान का प्रेरणा स्रोत भले ही हो परंतु यह संविधान का भाग नहीं है।
• यह संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है।
• सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य केस (1965) -
इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना को संविधान भाग नहीं माना ।
• शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार वाद (1951) -
इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि में प्रस्तावना को संविधान भाग नहीं माना ।
• गोलखनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) -
इसमे Supreme Court ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है।
• केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद (1973) -
इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि प्रस्तावना संविधान का सम्माननीय भाग है। इससे संविधान के उन तत्वों को पता लगाने में आसानी होती है जो संविधान की आधारभूत संरचना का हिस्सा है।
☞ 17 Oct 1949 को संविधान सभा में प्रस्तावना पर बहस हुई थी। बहस के बाद प्रस्तावना को संविधान का भाग बनाने के लिए प्रस्तावित किया था तथा सभा ने सर्वसम्मति से संविधान सभा को भाग माना।
• निष्कर्ष :-
उपर्युक्त वादों व विवेचनाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रस्तावना संविधान काभाग है। इसमें संशोधन किया जा सकता है परंतु इसके आधारभूत संरचना में संशोधन नहीं किया जा सकता।
★ प्रस्तावना में संशोधन
• केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद संविधान के सभी भागों में संशोधन कर सकती है किंतु ऐसा कोई परिवर्तन नहीं कर सकती जो कि संसद की आधारभूत संरचना के विरुद्ध हो ।
➤ 42 C. A.A. 1976 में प्रस्तावना में संशोधन किया जा चुका है। ( समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखण्डता )
★ प्रस्तावना की आलोचना पक्ष -
• प्रस्तावना न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है। अतः इसका कोई कानूनी महत्व नहीं है।
• प्रस्तावना में स्पष्टता का अभाव है क्योंकि इसमें आदर्शों एवं लक्ष्यों को सही ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है,जैसे- पंथनिरपेक्ष, समाजवाद आदि शब्द विवादित विषय के रूप में रहे ।
• प्रस्तावना न तो विधायिका शक्ति का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर प्रतिबंध लगाती है।